ट्रंप और नेतन्याहू की मुलाकात: गाज़ा समझौते पर 72 घंटे की अनिश्चितता

ravinder General
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व्हाइट हाउस के भव्य हॉल में डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू ने एक ऐतिहासिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए। मीडिया ने इसे तुरंत ही 20-प्वाइंट गाज़ा डील का नाम दिया। हालांकि, इस योजना में एक खास मोड़ भी था—72 घंटे का सस्पेंस।

यूरोप, अमेरिका और एशिया के देश इस समझौते के नतीजों को लेकर असमंजस में हैं। चीन की ओर से कोई आधिकारिक बयान तो नहीं आया, लेकिन सरकारी अख़बार चाइना डेली ने इसे अस्थायी और अधूरी संज्ञा देते हुए लिखा कि हमास ने अब तक इस योजना को स्वीकार नहीं किया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भले ही अमेरिका और इज़रायल के बीच सहमति बनी हो, लेकिन योजना की सफलता हमास की प्रतिक्रिया पर ही निर्भर करेगी।

द न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में गाज़ा प्लान का ज़िक्र करते हुए लिखा कि हमास को अंततः इससे सहमत होना ही पड़ेगा। अख़बार ने दावा किया कि नेतन्याहू की पार्टी इस पहल की सराहना करेगी, लेकिन दक्षिणपंथी गठबंधन से कड़ा विरोध सामने आ सकता है।

द वॉशिंगटन पोस्ट ने हमास के रुख को लेकर सवाल उठाते हुए लिखा कि नेतन्याहू ने ट्रंप के दबाव में यह समझौता स्वीकार किया है, लेकिन हमास से जुड़ी शर्तें निश्चित रूप से अस्वीकृत की जाएंगी।

ब्रिटेन के द गार्जियन ने नेतन्याहू की संयुक्त राष्ट्र से अपील को प्रमुखता दी है, जिसमें उन्होंने पश्चिमी देशों द्वारा फिलिस्तीन को मान्यता दिए जाने की आलोचना की। वहीं, द टाइम्स ऑफ इज़रायल ने फिलिस्तीनी अथॉरिटी के सहयोग की संभावना और क़तर से माफ़ी का भी उल्लेख किया है।

इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सोमवार को व्हाइट हाउस में एक महत्वाकांक्षी शांति योजना की घोषणा की, जो गाज़ा में लगभग दो वर्षों से जारी युद्ध को समाप्त करने का दावा करती है। 20-सूत्रीय इस योजना में तत्काल युद्धविराम, बंधकों की अदला-बदली, इज़रायली सेना की चरणबद्ध वापसी, हमास का पूर्ण निरस्त्रीकरण और एक अंतरराष्ट्रीय संक्रमण सरकार की स्थापना जैसे बिंदु शामिल हैं। योजना के तहत गाज़ा के पुनर्निर्माण का भी खाका तैयार किया गया है, जिसकी निगरानी पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर और ट्रंप स्वयं करेंगे। .

हालांकि, हमास की आधिकारिक प्रतिक्रिया अब तक न आने से सस्पेंस बना हुआ है। यही कारण है कि सवाल उठ रहे हैं - क्या यह डील वास्तव में शांति लाएगी या फिर इज़रायल को हमास के खिलाफ ‘अंतिम हमला’ करने का बहाना देगी?